भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 (Bharatiya Nyaya Sanhita Section 4) – दंड के प्रकार और पूरा विवरण

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 (Bharatiya Nyaya Sanhita Section 4) – दंड के प्रकार और पूरा विवरण

अपडेट: 29 अक्टूबर 2025 | लेखक: DhanIndia टीम

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 क्या है?

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 (Bharatiya Nyaya Sanhita Section 4) दंड से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है। यह धारा बताती है कि अपराधी को किन-किन प्रकार के दंड दिए जा सकते हैं। इस धारा के अंतर्गत छह प्रमुख दंड शामिल हैं — मृत्यु दंड, आजीवन कारावास, कारावास (कठोर/साधारण), संपत्ति जब्ती, जुर्माना और सामुदायिक सेवा

यह धारा पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 53 की जगह लाई गई है और इसमें सुधारात्मक दृष्टिकोण (Reformative Approach) को प्राथमिकता दी गई है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 के अंतर्गत दंड के प्रकार

(a) मृत्यु दंड (Death Penalty)

यह सबसे कठोर दंड है और केवल “rarest of rare” मामलों में दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों में यह सिद्धांत दोहराया गया है कि मृत्यु दंड तभी उचित है जब अपराध समाज की मूल संवेदना को झकझोर दे।

(b) आजीवन कारावास (Life Imprisonment)

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 में आजीवन कारावास का अर्थ स्पष्ट रूप से “प्राकृतिक जीवन के शेष समय” तक कारावास बताया गया है। यह सजा केवल गंभीर अपराधों में लागू होती है।

(c) कठोर और साधारण कारावास

कठोर कारावास में अपराधी को श्रम करना पड़ता है (जैसे जेल में काम), जबकि साधारण कारावास में ऐसा श्रम अनिवार्य नहीं होता। कोर्ट अपराध की गंभीरता देखकर तय करता है कि कौन-सा कारावास उचित रहेगा।

(d) संपत्ति का विलोपन / जब्ती

अगर अपराधी ने अपराध के माध्यम से कोई आर्थिक लाभ या संपत्ति अर्जित की है, तो न्यायालय उस संपत्ति को जब्त कर सकता है। यह प्रावधान आर्थिक अपराधों में विशेष रूप से उपयोगी है।

(e) जुर्माना (Fine)

जुर्माना अकेला दंड भी हो सकता है और अन्य दंडों के साथ भी लगाया जा सकता है। यह धारा आर्थिक रूप से जिम्मेदारी तय करने का साधन है।

(f) सामुदायिक सेवा (Community Service)

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 का सबसे आधुनिक तत्व “सामुदायिक सेवा” है। यह नया सुधारात्मक उपाय है, जिसके अंतर्गत अपराधी को समाजहित के कार्य करने का आदेश दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए — पार्क की सफाई, अस्पतालों में मदद, ट्रैफिक नियंत्रण या सामाजिक कार्यक्रमों में सहयोग। दिल्ली सरकार ने इसके लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 का उद्देश्य

इस धारा का उद्देश्य केवल अपराध को दंडित करना नहीं बल्कि अपराधी को सुधारने का अवसर देना भी है। BNS सुधार और पुनर्वास (Rehabilitation) पर अधिक ध्यान देता है ताकि अपराधी दोबारा समाज का उपयोगी सदस्य बन सके।

उदाहरण — धारा 4 के अंतर्गत दंड कैसे लागू होते हैं?

  • छोटे अपराध: सामुदायिक सेवा या जुर्माना।
  • आर्थिक अपराध: संपत्ति जब्ती या कठोर कारावास।
  • गंभीर अपराध: आजीवन कारावास या मृत्यु दंड।

न्यायालयीन दृष्टिकोण और महत्वपूर्ण निर्णय

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण:

सुप्रीम कोर्ट ने Bachan Singh vs State of Punjab (1980) में कहा था कि मृत्यु दंड केवल “rarest of rare” परिस्थितियों में दिया जाना चाहिए। भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 इसी सिद्धांत को आधुनिक रूप में आगे बढ़ाती है।

Community Service पर दिशा-निर्देश:

Delhi High Court ने हल्के अपराधों में सामुदायिक सेवा को दंड का उपयुक्त विकल्प माना है। इस फैसले के बाद दिल्ली सरकार ने community service के लिए गाइडलाइन जारी की — जैसे सफाई कार्य, पुस्तकालय रखरखाव आदि।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 के तहत न्यायालय किन बातों पर विचार करता है?

  • अपराध की प्रकृति और गंभीरता
  • अभियुक्त का आपराधिक इतिहास
  • सुधार की संभावना
  • सामाजिक प्रभाव
  • क्या सामुदायिक सेवा पर्याप्त दंड होगी?

निष्कर्ष — भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 का महत्त्व

भारतीय न्याय संहिता की धारा 4 ने भारत के आपराधिक न्याय-तंत्र को एक नया और मानवीय आयाम दिया है। इसने पारंपरिक दंड व्यवस्था में सुधारात्मक विकल्प जोड़े हैं। अब अदालतें केवल सजा देने की बजाय, अपराधी के सुधार और समाज के पुनर्संतुलन पर ध्यान केंद्रित कर सकती हैं। सामुदायिक सेवा जैसे प्रावधान भविष्य में अपराध-निवारण और समाज सुधार के प्रभावी उपकरण बन सकते हैं।

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